मुजफ्फरनगर- बच्चों की जिद्द और गुस्से का इलाज है ‘परवरिश की पाठशाला’, जडौदा में विशेषज्ञों ने दी बड़ी चेतावनी

By प्रशांत खत्री

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मुजफ्फरनगर- आज के दौर में बच्चों में बढ़ता मोबाइल एडिक्शन, जिद्द और गुस्सा माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। इसी गंभीर विषय पर जडौदा स्थित होली चाइल्ड पब्लिक इण्टर कॉलेज में “संस्कार एवं परवरिश की पाठशाला” कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें विशेषज्ञों ने अभिभावकों को बताया कि कैसे उनकी छोटी सी लापरवाही बच्चों को मोबाइल का गुलाम बना रही है।

मुख्य वक्ता और परवरिश विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) अनिल कश्यप योगी ने बताया कि न्यूरोसाइंस के अनुसार, 7 वर्ष की आयु तक बच्चे का 90 प्रतिशत मस्तिष्क विकसित हो जाता है। उन्होंने कहा, “जब माता-पिता बच्चों को समय नहीं देते, तो मोबाइल ‘डिजिटल बेबीसिटर’ बन जाता है।” मोबाइल से मिलने वाला ‘डोपामिन’ बच्चों के धैर्य को खत्म कर उन्हें चिड़चिड़ा और जिद्दी बना रहा है।

कार्यशाला का सबसे भावुक पल तब आया जब 9 वर्षीय ‘निर्मिता’ ने एक कहानी सुनाई। उसने संदेश दिया कि यदि बच्चा एआई (AI) मशीन की तरह हर बात मानने लगे और शरारत करना बंद कर दे, तो बचपन की यादें ही खत्म हो जाएंगी। बच्चों की छोटी-छोटी नादानियां और जिद्द ही भविष्य की वे यादें हैं जिन्हें माता-पिता ताउम्र संजोते हैं। अभिभावकों को बच्चों से ‘परफेक्ट मशीन’ बनने की उम्मीद छोड़कर उन्हें समय देना चाहिए।

विशेषज्ञ श्रीमती रितु कश्यप ने माताओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि मां तनाव या डिप्रेशन में है, तो बच्चे की परवरिश संतुलित नहीं हो सकती। उन्होंने माताओं को ‘मी टाइम’ निकालने और आपसी संवाद मजबूत करने की सलाह दी। वहीं, विशिष्ट अतिथि डॉ. राजीव कुमार ने कहा कि सूचना क्रांति ने पारिवारिक संवाद को कम कर दिया है, जिसे सुधारने की जरूरत है।

विद्यालय के प्रधानाचार्य प्रवेंद्र दहिया ने कहा कि स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों में मोटापा और नींद की कमी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, इसीलिए इस कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के अंत में एक लकी ड्रा प्रतियोगिता हुई, जिसमें यस्मिन, अंकित, सुमन, शालिनी, सचिन, पूनम समेत कई अभिभावकों को पुरस्कृत किया गया।

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