मुजफ्फरनगर- (बेजुबान पर बरपा इंसानी कहर) जनपद के मीनाक्षी चौक स्थित सिटी सेंटर के बेसमेंट से इंसानियत को शर्मसार करने वाला एक मामला सामने आया है। बीती 21 जनवरी की रात, जब पूरा शहर सो रहा था, तब एक युवक ने हाथ में डंडा लेकर एक गर्भवती कुतिया पर इतनी बेरहमी से हमला किया कि देखने वालों की रूह कांप गई। इस क्रूरता के कारण कुतिया के पेट में पल रहे अजन्मे बच्चों की मौत हो गई और वह स्वयं लहूलुहान होकर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है।
सीसीटीवी ने खोली दरिंदगी की पोल
यह पूरी घटना वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पशु प्रेमियों में भारी आक्रोश फैल गया। शुक्रवार को अर्जुन फाउंडेशन की टीम ने तत्काल संज्ञान लेते हुए आरोपी युवक को सिटी सेंटर से ढूंढ निकाला। पूछताछ में आरोपी ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया, जिसके बाद टीम और स्थानीय लोगों ने उसे खालापार पुलिस चौकी के सुपुर्द कर दिया। फिलहाल पीड़ित कुतिया का रेस्क्यू कर उपचार शुरू करा दिया गया है।
क्या बेजुबानों के प्रति हमारी संवेदना मर चुकी है?
यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि समाज की संवेदनहीनता का आईना है। ऐसे में एक सवाल उठता है- अक्सर नगर में ‘डॉग बाइट’ (कुत्तों के काटने) की घटनाओं पर शोर मचता है, लोग अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतर आते हैं, लेकिन जब एक बेजुबान पर इतना बड़ा कहर बरपाया गया, तो समाज मौन क्यों है? क्या उन अजन्मे बच्चों की हत्या का जिम्मेदार केवल वह युवक है, या वह समाज भी जो पशुओं के प्रति केवल नफरत पालना जानता है?
क्रूरता समाधान नहीं, जागरूकता ही रास्ता है
आवारा पशुओं की समस्या से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन क्या हिंसा इसका समाधान है? पशु विशेषज्ञों का मानना है कि जानवर अक्सर तभी आक्रामक होते हैं जब उन्हें डराया जाता है या उनके बच्चों को नुकसान पहुँचाया जाता है। यदि कोई पशु समस्या पैदा कर रहा है, तो उसका सही रास्ता प्रशासन को सूचित करना, नसबंदी (ABC Program) को बढ़ावा देना या शेल्टर होम भेजना है, न कि उसे डंडों से मारना।

निष्कर्ष– यदि हम समाज में शांति चाहते हैं, तो हमें ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत को अपनाना होगा। आज अर्जुन फाउंडेशन ने जो कदम उठाया है, वह प्रशंसनीय है, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब हर नागरिक बेजुबानों के दर्द को समझेगा। मासूम अजन्मे बच्चों की मौत का हिसाब शायद कानून न ले पाए, लेकिन प्रकृति की अदालत में हम सभी दोषी हैं।
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अर्जुन फॉउंडेशन ने रेस्क्यू के बाद उक्त पीड़ित फीमेल डॉग का एक्सरे कराया और अल्ट्रासाउंड करवाया। जिसमें पशुप्रेमियों को विचलित करने वाली अत्यंत दुःखद समाचार मिला। फीमेल डॉग के पेट में पल रहे 8-8 के अजन्मे बच्चे मृत पाए गए। अर्जुन फाउंडेशन से जुड़े डॉ सन्दीप ने बताया अभी 3 मृत बच्चे बाहर आ चुके हैं जबकि 5 मृत बच्चे अभी पेट में ही हैं उसका उपचार अभी चल रहा है।
मुज़फ्फरनगर व्यूज़ | मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
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